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विचार, संस्कृति, परिवार, समाज और जीवन-दर्शन पर चयनित लेख।
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शिक्षा से विश्व का चहुंमुखी विकास
शिक्षा मानव जीवन का आधार है। यह एकमात्र अध्ययन-लिखना शिक्षण का माध्यम नहीं है, बल्कि व्यक्ति के ज्ञान, विचार, चरित्र और व्यक्तित्व का विकास करने वाली शक्ति है। किसी भी देश और विश्व की प्रगति का मुख्य आधार शिक्षा ही है। शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति, समाज और राष्ट्र का सर्वांगीण विकास संभव है।सबसे पहले,…
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कुलीन व्यक्ति
अनमोल वचन :-शेर जंगल में हिरण का ही मांस खाता है। भूखा होने पर भी वह घास नहीं खाता है। उसी प्रकार कुलीन (आर्य, श्रेष्ठ) व्यक्ति कष्ट में होने पर भी नीति के मार्ग पर ही चलता है, उसका उल्लंघन नहीं करता।
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महान् अनर्थ
अनमोल वचन :-दुष्ट बुद्धि अपने अभिप्राय को छिपाकर आचरण करते हैं। दुसरों के छिद्र देखकर प्रहार करते हैं जिससे महान् अनर्थ हो सकता है।
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परम्परागत सनातन संस्कृति
अनमोल वचन :-श्रुतियों, स्मृतियों और पुराणों ने जिसकी सराहना की है, जो सबको कल्याण प्रदान करने वाली, परम पवित्र पुण्यदायी और व्यावहारिक है, वही परम्परागत सनातन संस्कृति है।
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इस संसार में
अनमोल वचन :-सरलता को धर्म कहते हैं और कुटिलता को अधर्म कहते हैं। इस संसार में सरलता से युक्त मनुष्य ही धर्म से युक्त होता है।
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मनुष्य शरीर में
अनमोल वचन :-आलस्य मनुष्य में स्थित सबसे बड़ा शत्रु है तथा परिश्रम के जैसा कोई मित्र नहीं है, जिसके करने से कोई दुःखी नहीं रहता।
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विरले पुत्र को
अनमोल वचन :-जो व्यक्ति सम्पत्ति में हर्ष, विपत्ति में दुःख और युद्ध में भीरुता नहीं दिखाता ऐसा व्यक्ति तीनों लोकों में दुर्लभ है और ऐसे विरले पुत्र को कोई भाग्यशाली माता ही जन्म देती है।
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सफलता पाने के लिए
अनमोल वचन :-काम, क्रोध, लाभ, स्वाद, शृंगार, व्यर्थ की बातों में ध्यान देना, अतिशय निद्रा, शक्ति से ज्यादा सेवा – यह आठ वस्तुएं विद्यार्थियों के लिए त्याज्य हैं। अध्ययन में पूर्णरूप से सफलता प्राप्त करने के लिए विद्यार्थियों को इन आदतों का त्याग करना चाहिए।
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मंगल कारी गाय
अनमोल वचन :-गोओ! तुम कृश शरीर वाले व्यक्ति को हृष्ट-पुष्ट कर देती हो एवं तेजोहीन को देखने में सुंदर बना देती हो। इतना ही नहीं, तुम अपने मंगलमय शब्द से हमारे घरों को मंगलमय बना देती हो। इसी से सभाओं में तुम्हारे ही महान् यश का गान होता है।
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बुरे संग से
अनमोल वचन :-गुणी जनों के सानिध्य में ही सद्गुण विकसित होते हैं, बुरे संग से गुण भी दोष में बदल जाते हैं। जैसे नदी का मीठा जल समुद्र के सानिध्य में अपने गुण को खो देता है और खारा हो पीने योग्य नहीं रहता।