श्रेणी: स्वरचित रचनाएँ
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श्रेणी: अपनी कवितायेँ
आत्म-प्रकाश
मैं क्यों बुद्धि का अंधा हो गया हूं?दो-तीन गुणों का तो मालिक बन गया हूंजो भी मैं बड़ाई प्राप्त करता हूंक्यों उसमें खुद को खुद भूल गया हूंधन्य है कि बड़ाई मेरे पास आती हैपर वह मुझ में विराजित दिव्यांश को जाती हैबस यह धारणा मेरी गलत हो गईराह भी मेरी आगे की आसान हो…
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श्रेणी: अपनी कवितायेँ
आत्म-जागरण
पराई आशा पर जीने वाले!पराए प्रकाश पर चलने वाले!पराई मेहनत खाने वाले!रास्ता छोड़ भटकने वाले!मिलेगी तुझे कब तक आस?मिलेगा तुझे कब तक प्रकाश?मिलेगा तुझे कब तक खाना?पड़ेगा तुझे कब तक पछताना?अपने साहस पर तू कर ले आस,अपनी राह पर खुद कर ले प्रकाश,नित अपनी मेहनत का खाया कर,जीवन की सही राह अपनाया कर,पराई आस पर…
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4. वैदिक वर्ण व्यवस्था का सत्य
जुलाई 2017 मातृवंदना सामाजिक जन चेतना इस लेख का मुख्य प्रेरणा-स्रोत लाला ज्ञान चंद आर्य द्वारा लिखित “वर्ण व्यवस्था का वैदिक रूप” पुस्तक है l यह पुस्तक उनका अपने आप में एक हृदय स्पर्शी और अनूठा प्रयास है l पुस्तक में दर्शाया गया है – मानव शरीर के अवयव मुख-ब्राह्मण, बाहु-क्षत्रिय, उदर–वैश्य और पैर–शूद्र…
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3. मानव जीवन रहस्य
मातृवंदना जून 2017 ईश्वर की संरचना प्रकृति जितनी आकर्षक है, वह उतनी विचित्र भी है l जड़-चेतन उसके दो रूप हैं l इनमें पाई जाने वाली विभिन्न वस्तुओं और प्राणियों की अपनी-अपनी जातियां हैं l इन जातियों में मात्र मनुष्य ही प्रगतिशील प्राणी है l वह विवेक का स्वामी है l गुरु के सान्निध्य में…
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2. संपूर्ण ग्राम विकास का मूलमन्त्र
मातृवंदना मार्च अप्रैल 2017 हमारा भारत ग्रामों का राष्ट्र है l भारत तब पुनः विश्व शक्ति अथवा विश्वगुरु बन जायेगा, जब देश के समस्त गाँव विकसित हो जायेंगे l देश के हर गाँव में एक चिकित्सालय अवश्य होना चाहिए जिसमें चिकित्सक और चिकित्सा कर्मियों की कोई कमी न हो l हर चिकित्सालय, हर चिकित्सा सुविधा…