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विचार, संस्कृति, परिवार, समाज और जीवन-दर्शन पर चयनित लेख।
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शिक्षा से विश्व का चहुंमुखी विकास
शिक्षा मानव जीवन का आधार है। यह एकमात्र अध्ययन-लिखना शिक्षण का माध्यम नहीं है, बल्कि व्यक्ति के ज्ञान, विचार, चरित्र और व्यक्तित्व का विकास करने वाली शक्ति है। किसी भी देश और विश्व की प्रगति का मुख्य आधार शिक्षा ही है। शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति, समाज और राष्ट्र का सर्वांगीण विकास संभव है।सबसे पहले,…
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गुरु – आचार्य
– # विद्यार्थी को तराशकर एक योग्य ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र कोई बना सकता है तो वह गुरु ही हो सकता है l* – दूषित राजनीति से छुटकारा दिलाने हेतु चाणक्य जैसे आचार्यों को, चन्द्र गुप्त मौर्य जैसे विद्यार्थियों के साथ, आगे अवश्य आना पड़ता है l – जब जब चाणक्य जैसा कोई आचार्य…
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विद्याओं में पारंगता
# अगर हम जीवन चुनौतियों का सामना करने में शास्त्र – शस्त्र विद्याओं में पारंगत नहीं हुए तो एक दिन विधर्मियों द्वारा बांस की भांति छिल दिए जायेंगे l*
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सशक्त व्यक्ति
जीवन लक्ष्य –जीवन लक्ष्य की प्राप्ति, चुनौतियों का सामना किये बिना संभव नहीं lजीवन सार –जीवन – सार सबकी समझ में आने वाली वस्तु नहीं है l वह सत्य है और ये झूठ l वह दिन है और ये रात l
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एकाकी परिवार
परंपरागत संयुक्त परिवार से वर्तमान एकाकी परिवार बहुत भिन्न हैं । इनमें मात्र माता – पिता और नौकर – चाकर ही होते हैं । पिता नौकरी करता है और माता घर का सब कार्य करती है या दोनों ही नौकरी करने बहार जाते हैं । अगर वे दोनों नौकरी करते हों तो घर और बच्चे…
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संयुक्त परिवार
विश्व भर में अन्य सभ्यताओं की अपेक्षा मात्र सत्सनातन समाज ही एक ऐसा समाज है जिसकी दृष्टि से देखने पर मातृ – पक्ष में नानी – नाना, मामी – मामा, मासी – मासड़ मिलते हैं जबकि पितृ – पक्ष में पति-पत्नी, बेटी – बेटा, दादी – दादा, चाची – चाचा, ताई – ताया, बुआ -…
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माता – पिता
माता-पिता – गुरु माता – पिता बच्चे को वेद सम्मत संस्कार देते हैं । इसके साथ ही साथ वे परिवार/समाज का निर्माण/कल्याण भी करते हैं । जिस प्रकार महिला अपने परिवार और समाज की आंतरिक जिम्मेदारियों को भली प्रकार संभालती है, ठीक उसी प्रकार पुरुष भी परिवार हित में बाह्य जिम्मेदारियों को संभालते हैं ।परिवार…