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विचार, संस्कृति, परिवार, समाज और जीवन-दर्शन पर चयनित लेख।
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शिक्षा से विश्व का चहुंमुखी विकास
शिक्षा मानव जीवन का आधार है। यह एकमात्र अध्ययन-लिखना शिक्षण का माध्यम नहीं है, बल्कि व्यक्ति के ज्ञान, विचार, चरित्र और व्यक्तित्व का विकास करने वाली शक्ति है। किसी भी देश और विश्व की प्रगति का मुख्य आधार शिक्षा ही है। शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति, समाज और राष्ट्र का सर्वांगीण विकास संभव है।सबसे पहले,…
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वानप्रस्थ आश्रम
सत्सनातन धर्म के अनुसार जब घर में पुत्र का पुत्र पैदा हो जाये, तब मनुष्य को 50 वर्ष के पश्चात गृहस्थ जीवन त्यागकर वानप्रस्थ आश्रम या एकांत निवास में प्रवेश कर लेना चाहिए l वह समय मानव जीवन के कल्याणार्थ सर्वश्रेष्ठ माना गया है l
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गृहस्थ आश्रम
सत्सनातन धर्म के अनुसार जितेंद्रिय गुरु – शिष्य द्वारा वेद शास्त्र का संयुक्त पठन – पाठन, शस्त्र – शास्त्रों का शिक्षण – प्रशिक्षण अभ्यास द्वारा शारीरिक, मानसिक, बौध्दिक, और अध्यात्मिक शक्तियां अर्जित करने तथा स्नातक बनने के पश्चात युवा के लिए योग्य वर देखकर शादी करने या गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने का प्रावधान है…
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ब्रह्मचर्य आश्रम
सत्सनातन धर्म के अनुसार जिस आश्रय स्थली से जितेंद्रिय गुरु – शिष्य द्वारा वेद शास्त्र का संयुक्त पठन – पाठन, शस्त्र – शास्त्रों का शिक्षण – प्रशिक्षण अभ्यास के लिए गुरुकुल जाते हैं और उसके पश्चात उनके द्वारा जहाँ लौटकर विश्राम किया जाता है – ब्रह्मचर्य आश्रम कहलाता है l
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जीवन के चार आश्रम
आर्ष दृष्टिकोण से जीवन के चार आश्रम माने गए हैं l ये आश्रम जीवन के समस्त कर्मों को चार वर्गों में विभक्त करते हैं l ऐसा जीवन यापन करने से जीवन की बहुत सी समस्याओं को बड़ी सुगमता से निपटाया जा सकता है l
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वृद्ध अवस्था
वृद्ध अवस्था में मानव की कृश-काया भले ही उसका साथ न दे, पर वह अपने पिछले दीर्घ काल में किये गए कार्य अनुभवों से सम्पन्न अवश्य होता है l उसकी सन्तान चाहे तो उन अभिभावक के सानिध्य में बैठकर उनके कार्य अनुभवों से बहुत कुछ सीख सकती है l
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युवा अवस्था
युवा अवस्था में बच्चे का ज्ञान और विवेक परिपक्व हो जाता है l वह अपने जीवन में l अच्छे, बुरे या निषिद्ध कार्य का सही आंकलन कर सकता है l उसे अच्छे, बुरे या निषिद्ध कार्य का ज्ञान होता है l अभिभावक का उस पर सदैव आशीर्वाद बना रहना चाहिए l वह अपने जीवन में…
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किशोर अवस्था
इस अवस्था में बच्चे का ज्ञान और विवेक अपरिपक्व होता है l अच्छे बुरे या निषिद्ध कार्य का सही आंकलन नहीं होता है l वह जो भी कार्य करता है – उसे अच्छे बुरे या निषिद्ध कार्य का ज्ञान होना चाहिए l लेकिन वह कठिन और चुनौति पूर्ण जीवन यापन की अपेक्षा सुगम और सरल…
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बाल अवस्था
यह वह अवस्था है जिसमें बच्चा नटखट होता है l कोई बच्चा बहुत नटखट होता तो कोई कम लेकिन होता अवश्य है l उसमें बोध और विवेक दोनों ही सुप्त अवस्था में होते हैं, जो उसकी आयु बढ़ने के साथ – साथ जागृत होते हैं l आरम्भ में उसे कुछ भी ज्ञान नहीं होता है,…
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जीवन की चार अवस्थाएं
सत्सनातन धर्म में मनीषियों के द्वारा मानव जीवन की चार अवस्थाएं – बाल अवस्था, किशोर अवस्था, युवा अवस्था, और वृद्ध अवस्था निर्धारित की गई हैं l