जिज्ञासा-ज्ञान-जाग्रति

सत्सनातन शिव – शक्ति परिवार



नवीन लेख

विचार, संस्कृति, परिवार, समाज और जीवन-दर्शन पर चयनित लेख।

  • ,

    2. माँ

    जून 2011 मातृवन्दना सिंहनी बलवान सिंह जन्म देकर सदा अभय होकर सोती है गधी दस गधों की माँ होकर भी दुःख पाती, बोझा ढोती है सौ पुत्र थे, गन्धारी- धृतराष्ट्र के, दुःख ही दुःख पाया था पांच थे कुंती के प्यारे पांडव, दुःख में भी सुख पाया था माँ ! तू जनना धर्म परायण,ज्ञाननिष्ठ, कला…

    पढ़ें

  • ,

    1. मेहनत का राज

    मई 2011 मातृवन्दना मेहनत करने वालों को कम बहुत हैं नहीं करने वालों को हैं बहुत बहाने वही कहें आंगन टेढ़ाजो कभी नाचना न जाने मेहनत लग्न से होती है दिल – दिमाग एक करना जो जाने मेहनत करने वालों को कम बहुत हैं नहीं करने वालों को हैं बहुत बहाने जबरन न उनको कम…

    पढ़ें

  • , ,

    2. शिक्षा और अध्यात्म ने जोड़ा है बिखरा समाज

    मातृवंदना अप्रैल 2011 सत्य ब्रह्म है और ब्रह्म ही सत्य है l ऐसा वेद कहते हैं l वेद भारतीय संस्कृति और अध्यात्म के दिव्य आधार स्तंभ रहे हैं जो सदियों से मानव जाति में सत्य, कर्म, धर्म और शौर्यता का संचार करते आये हैं l हमारे पूर्वज आर्य थे l आर्य सत्यप्रिय, कर्मनिष्ठ, धार्मिक और…

    पढ़ें

  • ,

    2. विश्व दर्पण में भारतीय संस्कृति

    फरवरी 2011 मातृवंदनाप्राचीन भारत वर्ष विश्व मानचित्र पर आर्यावर्त देश रहा है l आर्य वेदों को मानते थे l वे अपने सब कार्य वेद सम्मत करते थे l वेद जो देव वाणी पर आधारित है, उन्हें ऋषि मुनियों द्वारा श्रव्य एवम् लिपिवद्ध किया हुआ माना जाता है l वेदों में ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद अथर्वेद प्रमुख…

    पढ़ें

  • ,

    1. सनातन है जीने की कला !

    15 जनवरी 2011 कश्मीर टाइम्सकिसी ने ठीक ही कहा है – “मन के हारे हार है, मन के जीते जीत lपारब्रह्म को पाइए, मन ही के प्रतीत”अर्थात मन से हार मान लेने से मनुष्य की हार होना निश्चित है परन्तु हारकर भी मन से न हारना और युक्ति-युक्त होकर अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए…

    पढ़ें

  • ,

    3. समृद्ध भारत और उसकी गरिमा

    दिसम्बर 2010 मातृन्दनाविश्व  में  भारत आर्यवर्त के नाम से जाना जाता था। उसे समृद्धि के उच्चासन पर सुशोभित  करने का श्रेय देश  के उन वीर व वीरांगनाओं को जाता है जो भारत के इतिहास में नक्षत्रों की भांति दीप्यमान हैं। उन्होंने अपने समस्त सुखभोगों का परहित के लिए त्याग कर दिया था। उन्हें राष्ट्र, समाज और जन हित…

    पढ़ें

  • ,

    1. राष्ट्रीय समर्थ भाषा

    2010 छमाही ज्ञान वार्तावह समाज और राष्ट्र  गूंगा है जिसकी न तो कोई अपनी भाषा  है और न लिपि। अगर भाषा  आत्मा है तो यह कहना अतिश्योक्ति  नहीं होगी कि भाषा  से किसी व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र  की अभिव्यक्ति होती हैं।विश्व में व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र का भौतिक विकास और आध्यात्मिक उन्नति के लिए स्थानीय, क्षेत्रीय, प्रांतीय,…

    पढ़ें

  • ,

    3. भारत माँ

    मातृवन्दना नवम्बर 2010 तू धरती, हमारी माता, गुण तेरे सारा जग गाता, करते हैं हम तुझे प्रणाम, भारत माँ ————-भारत माँ,सागसब्जी, तू तिलहन उपजाती, अनाज, कंदमूल हमें खिलाती, तू माँ, हम तेरी संतान, भारत माँ ————-भारत माँतुझे दुःख हमसे मिलते, युग बीत गए पीड़ा सहते, तू देती नहीं ध्यान, भारत माँ ——–भारत माँपूत कपूत हो…

    पढ़ें

  • ,

    4. वेद महिमा

    कश्मीर टाइम्स 3 अक्तूबर 2010 वेद भारती संस्कृति, वेद भारती समृद्धि, सत्यमेव जयते——-सत्यमेव जयतेवेद भारती आयना, वेद भारती आत्मा, सत्यमेव जयते——-सत्यमेव जयतेवेद भारती ज्ञान, वेद भारती विज्ञान, सत्यमेव——-सत्यमेववेद आर्य कर्म, वेद आर्य धर्म, सत्यमेव जयते——-सत्यमेव जयतेवेद मान भारती, वेद प्राण भारती, सत्यमेव जयते——-सत्यमेव जयतेवेद भू भारती, आर्य भू भारती, सत्यमेव जयते——-सत्यमेव जयतेवेद भाग्य विधाता, वेद…

    पढ़ें

  • ,

    2. हिंदी भाषा संकल्प

    मातृवन्दना सितम्बर 2010 हिंदी हो, हिन्द की भाषा, हिंदी से हिन्द की पहचान हो, हम सब बोलें भाषा हिंदी, यही संकल्प हमारा होघर हो या दफ्तर, गली चाहे कोई दुकान हो, निःसंकोच हम बोलें भाषा हिंदी, यही संकल्प हमारा होबात हो पत्र लिखने की या विज्ञापन प्रकाशन हो, लिखें हम भाषा हिंदी, यही संकल्प हमारा…

    पढ़ें