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विचार, संस्कृति, परिवार, समाज और जीवन-दर्शन पर चयनित लेख।
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शिक्षा से विश्व का चहुंमुखी विकास
शिक्षा मानव जीवन का आधार है। यह एकमात्र अध्ययन-लिखना शिक्षण का माध्यम नहीं है, बल्कि व्यक्ति के ज्ञान, विचार, चरित्र और व्यक्तित्व का विकास करने वाली शक्ति है। किसी भी देश और विश्व की प्रगति का मुख्य आधार शिक्षा ही है। शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति, समाज और राष्ट्र का सर्वांगीण विकास संभव है।सबसे पहले,…
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सत्य है तुझसे
सत्य है तुझसे जुदा नहीं, वह तुझ में ही समाया है l तार सितार से जुदा नहीं, मनः आवाज सितार से ही आया है ll
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कभी-कभी
कभी-कभी ऐसा हो गया, भ्रम में अँधेरा, प्रकाश हो गया l अँधेरा तो अँधेरा ही रहा, पर मनः तू भ्रष्ट राही हो गया ll
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उत्तम विद्या
ले लेना तू उत्तम विद्या नीच से, दूषित कुल से स्त्री रत्न l कह गया कोई संत प्यारा, मनः हर्ज नहीं करना ऐसा यत्न ll
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समय की मांग
कश्मीर टाइम्स 30 नवम्बर 2008 वह भी एक समय था जब देश में हर नौजवान किसी न किसी हस्त–कला अथवा अपने रोजगार से जुड़ा हुआ रहता था l चारों ओर सुख समृद्धि थी l देश में कृषि योग्य भूमि की कहीं कमी नहीं थी l पर ज्यों-ज्यों देश की जन संख्या टिड्डीदल की भांति बढ़ती…
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विद्या मंदिर और उसकी भूमिका
अगस्त 2022 मातृवंदना शिक्षा दर्पण माँ-बाप का सान्निध्य घर/परिवार बच्चे के लिए संस्कार, संस्कृति और सभ्यता निर्माण करने की पहली पाठशाला है l गुरु का सान्निध्य पाठशाला, विद्या मंदिर विद्यार्थी के लिए देश, सनातन धर्म-संस्कृति के प्रति जागरूक एवं सेवा हेतु तैयार करने वाली दूसरी पाठशाला है l शिक्षा नीति :– कोई भी भाषा सीखना बुरा…
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5. स्वातन्त्र्य आन्दोलन में आध्यत्मिक गुरुओं का योगदान
मार्च-अप्रैल 2022 मातृवंदना मनुष्य जीवन में गुरु मनुष्य जीवन में गुरु का महत्वपूर्ण और सर्वोच्च स्थान है l भारतीय संस्कृति में सबसे पहला गुरु माता को माना गया है l शिशु के बड़ा होने पर उसे अक्षर ज्ञान देने वाला गुरु उसके बाद आता है l अध्यात्म और भक्तिमार्ग में दिशा देने वाला गुरु उसके…
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4. निःस्वार्थ सेवा हेतु सद्भावना की आवश्यकता !
आलेख – सामाजिक चेतना मातृवन्दन फरवरी 2022साधू भूखा भाव का धन का भुखा नाहीं, धन का भूखा जो फिरे वो तो साधू नाहीं ll संत कवीर जी के इस कथनानुसार सज्जन या सत्पुरुष वही होता है जिसे किसी प्रकार का कोई लोभ न हो l लोभी पुरुष कभी साधू नहीं हो सकता l अगर लघु…
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2. कर्तव्य – सेवा ज्ञान का महत्व
आलेख – मातृवंदना 2022 फरवरीईश्वर अजर, अमर, अविकारी, सर्वव्यापक और निराकार है l वह निर्जीव में भी है और सजीव में भी l वह सबके भीतर भी है और बाहर भी l अर्थात वह कण-कण में विद्यमान है l जीव ईश्वर का अंश है l मानव शरीर की आकृति का प्रादुर्भाव परिवर्तनशील प्रकृति जल, वायु,…
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1. स्वाधीनता – हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है
मातृवंदना जनवरी 2022 लोकमान्य तिलक जी ने कहा था – स्वाधीनता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, हम उसे लेकर रहेंगे l 15 अगस्त 1947 से राजनीतिक दृष्टि से विश्व मानचित्र पर भारतवर्ष एक स्वतंत्र राष्ट्र है l उसका एक अपना संविधान है l दुसरे राष्ट्रों की भांति भारतवासी भी हर वर्ष अपना स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं…