सत्य –
सौ झूठ छिपाने के लिए एक और झूठ बोला जाये, तब भी वह झूठ ही रहता है, सत्य नहीं हो जाता l इसी तरह एक सत्य को छिपाने के लिए, बार – बार झूठ बोला जाये तब भी सत्य, सत्य ही रहता है, वह कभी झूठ नहीं हो जाता l यह सत्य है कि झूठ के अपने पांव नहीं होते हैं और सत्य, असत्य नहीं हो जाता, बल्कि वह अति कठोरता के साथ अपनी बात पर स्थिर रहता है l वह कभी विचलित नहीं होता है l
शरीर परिवर्तनशील है l आजका कोई एक शिशु कल बालक होता है, आज का किशोर कल युवा बनता है l आजका युवा कल प्रौढ़ हो जाता है l आजका प्रौढ़ कल वृद्ध होता है और फिर उसका देहावसान भी हो जाता है क्योंकि देह नश्वर है l देहावसान के पश्चात् उस देह से संबंधित संसारिक हर प्रिय वस्तु, रिश्ता उससे सदा के लिए टूट जाता है l लेकिन जो बदलता नहीं है, जो सदा जीवित रहता है वह मात्र आत्मा ही है l आत्मा ईश्वरांश है, जो सत्य है l
रात के पश्चात दिन और दिन के पश्चात रात होती है l यह प्रकृति का अपना नियम है l इसका अर्थ यह नहीं कि रात का अन्धकार – दिन का प्रकाश एक दूसरे के शत्रु हैं l दिन भर कार्य करने के पश्चात रात मनुष्य को विश्राम करने हेतु बनी है ताकि वह अगली सुबह तरो-ताजा होकर पुनः अपना कार्य आरम्भ कर सके l करना क्या है ? यह कर्त्ता की अपनी सोच पर निर्भर करता है l दिन योगी के लिए रात होती है जबकि रात उसके लिए दिन होता है l रात का समय उसकी साधना के लिए अनुकूल होता है, दिन नहीं, सत्य है l
सत्य निराकार है – ज्योति पुंज शिव-शक्ति – नर-नारी दो रूप हैं l वे सर्व व्याप्त हैं, निराकार भी l इन्हें शारीरिक चक्षुओं से नहीं, दिव्य चक्षुओं से ही निहारा जा सकता है l शिव सदैव ध्यानस्थ समाधि में लीन रहते हैं जबकि शक्ति – जग जननी, माँ भवानी – प्रकृति के रूप में सभी जीवों का पालन – पोषण करती है l
सत्य साकार भी है – शिव-शक्ति – नर-नारी रूप में साकार हैं l नारी सृष्टि की रचना करती है बच्चों को शिक्षा देती है जबकि नर परिवार की रक्षा और उसका पालन-पोषण करता है l घर में माता-पिता, विद्यालय में अध्यापक, समाज में अध्यात्मिक गुरु शिव-शक्ति का साकार रूप हैं l अगर हम एक ओर अपने साक्षात् शिव शक्ति – माता-पिता, आध्यापक/अध्यापिका, अध्यात्मिक गुरु/गुरु माता का निरादर करते हैं और दूसरी ओर हम मंदिर जाते हैं, तीर्थ करते हैं तो वह मात्र ढोंग, अश्रद्धा और लोक दिखावा ही है, भक्ति नहीं l वास्तविक श्रद्धा और भक्ति उनका आदर सम्मान करने में निहित है l
सनातन बोध –
मनुष्य शरीर में पांच कर्मेन्द्रियाँ, पांच ज्ञानेन्द्रियाँ, पांच इन्द्रिय विषय, पांच इन्द्रिय विषयों के विषय, मन, चित, अहंकार और बुद्धि पाई जाती है l
जब मनुष्य की इन्द्रियां अन्तर्मुखी हो जाती हैं तो उसका मन भी उसी का अनुसरण करने लगता है l बुद्धि स्थिर हो जाती है और वह आत्म समर्पित होकर परमात्मा की ओर अग्रसित होने लगती है l यह सब एक बार में नहीं, धीरे – धीरे अभ्यास करने से होता है और लंबा समय लगता है l यही साधक के लिए धीरज का समय होता है, लेकिन अंत में इसका फल सुखदायी ही होता है l
मनुष्य को सनातन बोध कब होता है ? सनातन बोध का अर्थ है – शाश्वत सत्य का बोध, अर्थात यह अनुभूति कि जीवन, आत्मा, धर्म और ब्रह्म का सत्य समय, स्थान और परिस्थिति से परे है। यह केवल बौद्धिक ज्ञान नहीं, बल्कि अंतरात्मा में घटित होने वाली अनुभूति है। मनुष्य को सनातन बोध किसी एक क्षण में नहीं, बल्कि एक प्रक्रिया के रूप में होता है। इसे हम निम्न चरणों में समझ सकते हैं –
1. जब मनुष्य बाह्य भोगों से असंतोष अनुभव करता है –
प्रारंभ में मनुष्य धन, पद, सुख, संबंध और भौतिक उपलब्धियों में आनंद खोजता है। लेकिन एक समय ऐसा भी आता है जब वह अनुभव करता है कि – सुख क्षणिक है, इच्छाएँ समाप्त नहीं होतीं, उपलब्धियों के बाद भी शून्यता बनी रहती है l यहीं से पहला प्रश्न उठता है – “क्या जीवन केवल इतना ही है?” यही प्रश्न सनातन बोध की ओर पहला कदम है।
2. जब ‘मैं कौन हूँ ?’ का प्रश्न जन्म लेता है –
सनातन बोध तब आरंभ होता है जब मनुष्य शरीर और पहचान से आगे सोचने लगता है – क्या मैं केवल शरीर हूँ ? क्या मैं मन हूँ? जन्म और मृत्यु के बीच का मैं कौन हूँ ? उपनिषद कहते हैं -“कोऽहम्?” — मैं कौन हूँ? जब यह प्रश्न गंभीर हो जाता है, तब मनुष्य सांसारिक नहीं, आध्यात्मिक खोज में प्रवेश करता है।
3. जब मनुष्य दुःख को शिक्षक के रूप में स्वीकार करता है –
अक्सर सनातन बोध दुःख, हानि, असफलता या विरक्ति के बाद प्रकट होता है। किसी प्रिय का वियोग, जीवन में बड़ा आघात, अहंकार का टूटना l भगवद्गीता में अर्जुन का उदाहरण यही है – युद्धभूमि में विषाद से ही उसे ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति का मार्ग मिला। दुःख जब प्रश्न बन जाए, तब वह ज्ञान का द्वार खोलता है।
4. जब कर्म से अधिक कर्तव्य का भाव जागता है –
सनातन बोध का एक बड़ा संकेत है -“मैं क्या पा रहा हूँ ?” से “मैं क्या निभा रहा हूँ?” की ओर यात्रा, जब मनुष्य निष्काम कर्म की ओर बढ़ता है – कर्म करो, फल छोड़ो l तब वह धर्म को सामाजिक नियम नहीं, बल्कि ब्रह्म का विधान समझने लगता है।
5. जब शास्त्र, संत और स्वअनुभूति एक हो जाते हैं –
सनातन बोध तब परिपक्व होता है जब – शास्त्र पढ़े जाते हैं (गीता, उपनिषद, वेद), गुरु या संत का सान्निध्य मिलता है और सबसे महत्वपूर्ण— स्वयं की अनुभूति होती है l केवल पढ़ने से नहीं, जीने से बोध होता है।
6. जब द्वैत से अद्वैत की अनुभूति होती है –
अंततः सनातन बोध तब होता है जब मनुष्य अनुभव करता है कि – मैं और संसार अलग नहीं, आत्मा और परमात्मा भिन्न नहीं, जीव ही शिव है l उपनिषद का महावाक्य – “अहं ब्रह्मास्मि” — मैं ब्रह्म हूँ l यह अहंकार नहीं, बल्कि अहंकार का लय है।
मनुष्य को सनातन बोध तब होता है जब – भोग से वैराग्य आता है, प्रश्न आत्मा से जुड़ जाते हैं, दुःख ज्ञान का द्वार बनता है, कर्म निष्काम हो जाता है, शास्त्र, गुरु और अनुभव एक हो जाते हैं और अंत में “मैं” का विस्तार “सर्व” में हो जाता है l
सनातन धर्म –
झूठ सत्य के आगे कभी टिकता नहीं है और सत्य कभी टूटता नहीं है l शरीर की मृत्यु होती है, आत्मा की नहीं – आत्मा अमर है l अन्धकार और प्रकाश एक दूसरे के पूरक हैं – यही सत्य है l जो सत्य पहले था, वही सत्य अब है और वह सत्य आगे भी रहेगा, यही परम सत्सनातन है l
इससे संबंधित सत्सनातन धर्म का महत्व बहुत गहन और व्यापक है l यह मात्र एक धर्म नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक सर्वोत्तम पद्धति है, जो मानव को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – इन चार पुरुषार्थों की ओर मार्गदर्शन करती है l
1 शाश्वत और सार्वभौमिक धर्म – “सनातन” का अर्थ है जो सदा रहने वाला हो l सनातन धर्म किसी विशेष समय, स्थान या व्यक्ति से जुदा नहीं है; यह सृष्टि के प्रारम्भ से अस्तित्व में है और सृष्टि के अंत तक रहेगा l
2 जीवन के हर पहलु का मार्गदर्शन – सनातन धर्म जीवन के हर क्षेत्र – नैतिक, आचरण, परिवार, समाज, शिक्षा, राजनीति, प्रकृति आदि – में मार्ग दिखाती है l यह सिखाता है कि धर्मानुसार कर्म करना ही श्रेष्ठ जीवन है l
3 आत्मा और ब्रह्म का ज्ञान – यह धर्म बताता है कि आत्मा अमर है और हर जीव में परमात्मा का अंश विद्यमान है l इससे मानव में समभाव, करुणा, और अहिंसा की भावना उत्पन्न होती है l
4 कर्म और पुनर्जन्म का सिद्धांत – सनातन धर्म कर्मफल पर आधारित है l “जैसा कर्म करोगे वैसा फल पाओगे l” यह व्यक्ति को सत्कर्म करने और दुष्कर्म से बचने की प्रेरणा देता है l
5 प्रकृति और जीवों के प्रति सम्मान – सनातन धर्म सिखाता है कि प्रकृति, पशु, जल, वायु, अग्नि, आकाश – सब ईश्वर के ही रूप हैं l इसलिए यह पर्यावरण संरक्षण और सहस्तित्व का संदेश देता है l
6 मोक्ष का मार्ग – इसका अंतिम लक्ष्य – मुक्ति (मोक्ष) – यानी जन्म – मरण के चक्र से मुक्ति पाकर परमात्मा से एकत्व प्राप्त करना है l
7 सहिष्णुता और विश्वबंधुत्व – सनातन धर्म कहता है – “वसुधैव कुटुम्बकम” सारा संसार परिवार है l यह सब के प्रति सहिष्णुता और विश्व शान्ति का संदेश देता है l
सनातन धर्म का महत्व इस बात में है कि यह मानव को धर्मयुक्त, संतुलित और उद्देश्यपूर्ण जीवन जीने की शिक्षा देता है l यह केवल पूजा या आस्था का मार्ग नहीं, बल्कि जीवन का विज्ञान और सत्य का दर्शन है l
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