श्रेणी: स्वरचित रचनाएँ
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श्रेणी: मातृवंदना शिमला
5. स्वातन्त्र्य आन्दोलन में आध्यत्मिक गुरुओं का योगदान
मार्च-अप्रैल 2022 मातृवंदना मनुष्य जीवन में गुरु मनुष्य जीवन में गुरु का महत्वपूर्ण और सर्वोच्च स्थान है l भारतीय संस्कृति में सबसे पहला गुरु माता को माना गया है l शिशु के बड़ा होने पर उसे अक्षर ज्ञान देने वाला गुरु उसके बाद आता है l अध्यात्म और भक्तिमार्ग में दिशा देने वाला गुरु उसके…
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श्रेणी: मातृवंदना शिमला
4. निःस्वार्थ सेवा हेतु सद्भावना की आवश्यकता !
आलेख – सामाजिक चेतना मातृवन्दन फरवरी 2022साधू भूखा भाव का धन का भुखा नाहीं, धन का भूखा जो फिरे वो तो साधू नाहीं ll संत कवीर जी के इस कथनानुसार सज्जन या सत्पुरुष वही होता है जिसे किसी प्रकार का कोई लोभ न हो l लोभी पुरुष कभी साधू नहीं हो सकता l अगर लघु…
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श्रेणी: मातृवंदना शिमला
2. कर्तव्य – सेवा ज्ञान का महत्व
आलेख – मातृवंदना 2022 फरवरीईश्वर अजर, अमर, अविकारी, सर्वव्यापक और निराकार है l वह निर्जीव में भी है और सजीव में भी l वह सबके भीतर भी है और बाहर भी l अर्थात वह कण-कण में विद्यमान है l जीव ईश्वर का अंश है l मानव शरीर की आकृति का प्रादुर्भाव परिवर्तनशील प्रकृति जल, वायु,…
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श्रेणी: मातृवंदना शिमला
1. स्वाधीनता – हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है
मातृवंदना जनवरी 2022 लोकमान्य तिलक जी ने कहा था – स्वाधीनता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, हम उसे लेकर रहेंगे l 15 अगस्त 1947 से राजनीतिक दृष्टि से विश्व मानचित्र पर भारतवर्ष एक स्वतंत्र राष्ट्र है l उसका एक अपना संविधान है l दुसरे राष्ट्रों की भांति भारतवासी भी हर वर्ष अपना स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं…
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श्रेणी: मातृवंदना शिमला
5. “षड्यंत्र” बार-बार लेकिन “पलटवार” एक बार !
मातृवंदना दिसंबर 2021सनातन धर्म की कालगणना के अंतर्गत सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलयुग चार युग माने गए हैं l हर युग में धर्मी और अधर्मी लोग होते हैं l इतिहास साक्षी है कि सृष्टि में जब–जब अधर्म की वृद्धि और धर्म की हानि हुई है, तब-तब धर्म की रक्षा करने हेतु किसी न किसी महान…