श्रेणी: स्वरचित रचनाएँ
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4. और लम्बी होंगी बेरोजगार की शृंखलाएं
आलेख – सामाजिक चेतना मातृवन्दना सितम्बर 2008भारत में औद्योगिक क्रांति आने के पश्चात्, कल-कारखानों और मशीनों के बढ़ते साम्राज्य से असंख्य स्नातक, बेरोजगार की श्रृंखलाओं में खड़े नजर आने लगे हैं l उनके हाथों का कार्य कल-कारखाने और मशीनें ले चुकीं हैं l वह कठोर शरीर-श्रम करने के स्थान पर भौतिक सुख व आराम की…
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4. राष्ट्र -हित कितना बौना!
28 सितम्बर 2008 कश्मीर टाइम्सकिसी व्यक्ति का-अपना परिवार, परिवार का-समाज, समाज का-क्षेत्र, क्षेत्र का-राज्य, राज्य का-राष्ट्र, और राष्ट्र का-विश्व पूरक होता है। वे सब एक दूसरे पर निर्भर करते हैं। इन्हें स्वयं के निर्वहन हेतु आपस में मधुर संबंध और सामंजस्य बनाए रखना अति आवश्यक है।व्यक्ति से लेकर परिवार, समाज, क्षेत्र, राज्य और राष्ट्र को…
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3. सुखदायक सत्य कड़वा होता है
14 सितम्बर 2008 कश्मीर टाइम्सयोग्य गुरु द्वारा दिया जाने वाला ज्ञान सुपात्र का प्रदान किया जाता है, कुपात्र को नहीं। सुपात्र उसका सदुपयोग करता है जबकि कुपात्र दुरुपयोग। वही विद्यार्थी गुरु का मान बढ़ाता है और स्वयं महान बनता है जो गुरु के निर्देशानुसार जन सेवा एवं जग कल्याण के कार्य करता है।1 प्रकृति का…
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1. शहरी नाले की व्यथा
27 जुलाई 2008 कश्मीर टाइम्सअपना भी स्वच्छ जल था मेरासदा स्वच्छ ही नीर बहता थाहर जगह उपयोगी पानी चाहने बालोमुझमें गंदगी बहाओ नमुझे और दूषित बनाओ नतुम सुबहशाम आकर यहीं नहाते थेधोकर कपड़े साहिल पर ही सुखाते थेबना शिकार मच्छली चाव से खाने बालोमुझमें गंदगी बहाओ नमुझे और दूषित बनाओ नमेरे जल संग जल गंदा…
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2. बलि का बकरा
13 जुलाई 2008 कश्मीर टाइम्स समाजिक जन चेतना आज तक हमने देव स्थानों पर बकरों की बलि दिया जाना सुना था पर यह नहीं सुना था कि सड़क के किनारे बस की सवारियों को भी बलि का बकरा बनाया जाता है l जी हाँ, ठीक सुना आपने, ऐसा अब खुले आम हो रहा है l…