श्रेणी: स्वरचित रचनाएँ
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3. दस्तक – संपूर्ण क्रांति की
सितम्बर 2012 मातृवन्दनाइसमें लेश मात्र भी संदेह नहीं है कि युगों-यगों से भारतीय सनातन गुरुकुल शिक्षा-प्रणाली ने विश्व की विशाल धरती पर समस्त मानव समाज, संस्कृत स्थानीय भाषा , विद्या-कला, ज्ञान-विज्ञान, सभ्यता-संस्कृति तथा वैदिक साहित्य – दर्शन , शास्त्र आदि का सृजन, पोषण , रक्षा और उसका विकास किया। समस्या व्यक्तित्व विकास की रही हो या आर्थिक, सामाजिक रही हो या…
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1. जल संचयन
मातृवन्दना जून 2012 हमने बात वर्षा जल संचयन करने की मानी है, कृत्रिम भू-जल पुनर्भरण करने की ठानी है,बावड़ी, कुआँ, तलब, पोखर, जोहड़ का पानी,जंगल, पेड़-पोधे, खेतों में लाता है हरियाली,भू-जल दोहन नियम से अपनाओ,भू-जल बचाओ और जीवन बचाओ,आज बचाए पानी ने कल सबको बचाना है, बाग़ – बगीचे, फूलों पर भंवरों ने गुनगनाना है,परागण…
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2. सनातन जीवन में धन की उपयोगिता
मई 2012 मातृवन्दनाभारत ऋषि -मुनियों का देश है। भारतीय मनीषियों ने मानव जीवन को 100 वर्ष तक मुख्यतः चार आश्रमों में विभक्त किया था। उनमें प्रथम 25 वर्ष ब्रह्मचर्य, 25 से 50 वर्ष गृहस्थ, 50 से 75 वर्ष वानप्रस्थ और 75 से 100 वर्ष तक सन्यास आश्रम प्रमुख थे। उनके अपने विशेष सिद्धांत थे, उच्च आदर्श थे जिनके अनुसार मनुष्य अपना सार्थक एवं समर्थ जीवन…
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1. स्लोगन जल बाईसा
कश्मीर टाइम्स 6 मई 2012 जल है गुणों की खान, धरती की बढ़ाये शान, जल रहेगा,जीवन बचेगा, भू-जल बढ़ाओ,जीवन बचाओ, जल के संग,जल के रंग,जल है जहाँ, जीवन है वहां, जल, जीवन की आशा, सूखा, निराशा ही निराशा,जल की कहानी,जीवन की कहानी, जहाँ भू-जल सहारा है,वहां जीवन हमारा है, जल से पढ़, पेड़ों से जंगल,सूखे…
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1. सत्सनातन जीने की कला
मातृवंदना फरवरी 2012 किसी ने ठीक ही कहा है – “मन के हारे हार है, मन के जीते जीत lपारब्रह्म को पाइए, मन ही के प्रतीत”अर्थात मन से हार मान लेने से मनुष्य की हार होना निश्चित परन्तु हारकर भी मन से न हारना और युक्ति-युक्त होकर अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए निरंतर प्रयासरत…