श्रेणी: विविधा
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श्रेणी: आत्मोवाच दोहावली
ईर्ष्या
आग से खेलता है क्यों? वह रख बनाया करती है lतू इर्ष्या करता है क्यों ? मनः हँसते हुए को रुलाया करती है ll
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श्रेणी: आत्मोवाच दोहावली
सत्य
जान सके तो जान, सत्य ही है भगवान् lजायेगा तू पहचान, मनः थोड़ा-थोड़ा कर ध्यान ll
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श्रेणी: आत्मोवाच दोहावली
तीन शत्रु
आलस्य, झूठ, और अभिमान तीनों हैं तेरे शत्रु महान lएक को भी निकट न आने देना, मनः सुन ले तू देकर ध्यान ll
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श्रेणी: आत्मोवाच दोहावली
आशाओं का अँधेरा
आशाओं के घोर अँधेरे में, क्यों खो गया तेरा जीवन है ?तालाश खुद की खुद कर, मनः नाहक बना क्यों दीन-हीन है ll
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श्रेणी: आत्मोवाच दोहावली
विपदा
मुसीबत आ गई तो आने दे विपदा नहीं है कोई खास lनरमी-गर्मी का मौसम है, मनः तू हुआ है क्यों उदास ll