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धर्म की उपेक्षा के दुष्परिणाम

दिनांक 19 अप्रैल 2026

धर्म का आशय केवल पूजा-पाठ या कर्मकांड से नहीं है, बल्कि वह जीवन को सही दिशा देने वाली नैतिकता, कर्तव्यबोध, अनुशासन और मानवीय मूल्यों की समग्र व्यवस्था है। जब समाज या व्यक्ति धर्म की उपेक्षा करता है, तो उसके अनेक दुष्परिणाम सामने आते हैं।
1. नैतिक मूल्यों का पतन -
धर्म सत्य, अहिंसा, करुणा, ईमानदारी और संयम जैसे मूल्यों को सुदृढ़ करता है। धर्म की उपेक्षा से स्वार्थ, छल, भ्रष्टाचार और हिंसा बढ़ने लगती है। लोग सही-गलत का भेद भूलकर केवल लाभ को ही जीवन का उद्देश्य मान लेते हैं।
2. सामाजिक विघटन -
धर्म समाज को जोड़ने का कार्य करता है। इसके अभाव में परिवार टूटते हैं, बुज़ुर्गों का सम्मान घटता है और सामाजिक रिश्तों में अविश्वास बढ़ता है। परिणामस्वरूप समाज में अपराध, वैमनस्य और असहिष्णुता फैलती है।
3. मानसिक अशांति और तनाव -
धर्म मन को शांति और धैर्य प्रदान करता है। धर्म से दूर व्यक्ति भौतिक सुखों में उलझकर असंतोष, चिंता, अवसाद और तनाव का शिकार हो जाता है। जीवन में विपरीत परिस्थितियों का सामना करने की आंतरिक शक्ति कमजोर पड़ जाती है।
4. कर्तव्यबोध की कमी -
धर्म व्यक्ति को उसके कर्तव्यों का बोध कराता है—परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति। धर्म की उपेक्षा से लोग केवल अधिकारों की बात करते हैं, कर्तव्यों से मुंह मोड़ लेते हैं, जिससे सामाजिक व्यवस्था असंतुलित हो जाती है।
5. भौतिकवाद की अति -
धर्म जीवन में संतुलन सिखाता है। जब धर्म की उपेक्षा होती है, तब भोगवाद और उपभोग की प्रवृत्ति बढ़ जाती है। धन, पद और शक्ति ही सफलता का मापदंड बन जाते हैं, जिससे ईर्ष्या, प्रतिस्पर्धा और असंतोष बढ़ता है।
6. राष्ट्र और संस्कृति को क्षति -
धर्म हमारी संस्कृति और परंपराओं का आधार है। इसकी उपेक्षा से सांस्कृतिक मूल्यों का क्षरण होता है, राष्ट्र की एकता कमजोर पड़ती है और युवा पीढ़ी अपनी जड़ों से कटने लगती है।
7. आत्मिक पतन -
धर्म आत्मा की उन्नति का मार्ग दिखाता है। इसके बिना जीवन उद्देश्यहीन प्रतीत होने लगता है। व्यक्ति बाहरी सुखों में सब कुछ खोजता है, लेकिन आंतरिक शांति से वंचित रह जाता है।
अतः धर्म की उपेक्षा व्यक्ति और समाज—दोनों के लिए घातक है। धर्म अंधविश्वास नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित, संयमित और मूल्यनिष्ठ बनाने की प्रेरणा है। इसलिए आधुनिक युग में भी धर्म के मूल सिद्धांतों को अपनाकर ही एक स्वस्थ, शांत और समृद्ध समाज का निर्माण किया जा सकता है।

- संकलित

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