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विचार, संस्कृति, परिवार, समाज और जीवन-दर्शन पर चयनित लेख।
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सफलता के मूल स्रोत
दिनांक 15.10.26 जीवन में कोई भी उचित कार्य करना, किसी भी व्यक्ति का अपना जीवन उद्देश्य हो सकता है l उसमे सफलता प्राप्त करनी है तो उस व्यक्ति को उसके नियमों का पालन करना आवश्यक होता है l नियम पालन किये बिना उद्देश्य की प्राप्ति करना बहुत कठिन हो सकता है l अगर नियम…
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14. ईर्ष्या – घृणा
दैनिक जागरण 9 मई 2007आग से खेल रहा क्यों?वह राख बनाया करती हैईर्ष्या से भी प्रेम कर रहाहंसते को रुलाया करती हैघृणा कर नीच विचारों सेमगर इन्सान से नहींकरके ईर्ष्या घृणा इन्सान सेरह सकता तू सुख शांति से नहीं
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13. कोटि – कोटि प्रणाम
दैनिक जागरण 3 मई 2007मातृ भूमि तुझकोकरूं मैं क्या अर्पणसाहस नहीं मुझमेंबिन देरी करूं मैं आत्म समर्पणबस कार्य के सिवायफल की ओर न हो मेरा ध्यानसेवा की हो डगर अपनीऔर नित हो तुझे कोटि कोटि मेरा प्रणाम
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12. स्नान गृह में
दैनिक जागरण 29 अप्रैल 2007 दाढ़ी बना ले चाहे तू दांत साफ कर लेपर भाई चल पहले नल बंद कर देभूजल अनावश्यक बाहर आ रहाभूजल स्तर नीचे जा रहाअब फव्वारे से या टब में नहीं है नहानाबाल्टी भर पानी से ठीक है नहानाजब बाल्टी भर पानी से नहाया जा सकेदो बाल्टी भर पानी बहाना है…
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11. समय का स्वभाव
दैनिक जागरण 24 अप्रैल 2007समय तो बहता जल हैवह बहता जाता गाता हैतू संभाल पलपल की करता चलजीवन पलपल से बन पाता हैगोली छूटती है बन्दूक सेफिर कभी नहीं आती है हाथसकल दिवस जाता पलपल मेंघड़ी भी नहीं देती है साथ
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10. आलस्य
दैनिक जागरण 18 अप्रैल 2007 प्राप्त वस्तु से संतुष्ट हुआतूने मेहनत करना छोड़ा क्योंकोई वस्तु रहेगी कब तक पास तेरेकर्म से तूने नाता तोड़ा क्योंआलस्य में क्यों बैठ गयातू अपने हाथपांव पसारमिट्टी का खिलौना मिट्टी में मिला देदेख मेहनत का भी चमत्कारआलसी नहीं आलस्य भगा देतू अगल बगल से दूरघोड़ा तन है तेराचाबुक मेहनत मार…
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3. मेहनत
अमर उजाला 4 अप्रैल 2007कली से बनते हैं फूल खिलते हैं फूल कांटों में अभ्यास बनती है मेहनत रहती नहीं है मेहनत बातों में खोज जिसे होती है मंजिल पा ही लेता है बिना परिश्रम किए जो ढूंढता है अपना समय नष्ट कर लेता है मेहनत से मिलता है मान मेहनत से बनती है शान…
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9. धौलाधार का शृंगार
दैनिक जागरण 30 मार्च 2007 आहा कैसी सुन्दर ओढ़ी बर्फीली चादर धौलाधार नेशुष्क मौसम से पाई मुक्ति धौलाधार नेनाले झरने नदियां सब फिर बहने लगे हैंताल बावडि़यां कूप जल से भरने लगे हैंधरती खेत खलिहानों को मिलने लगा है पानीरिमझिम रिमझिम बरसने लगा है पानीबर्फ से किया है फिर श्रृंगार धौलाधार नेआहा कैसी सुन्दर ओढ़ी…
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2. सुख – शांति का रास्ता
अमर उजाला 30 मार्च 2007जातियां होती हैं जीव जंतुओं कीमनुष्य नर नारी की नहींकरके जातिगत बंटवारा समाज कापा सकता तू सुख शांति नहींकौन सी जाति क्या है जातिइससे नहीं है तेरा कोई वास्ताहर प्राणी है रूप ईश्वर कासुख शांति का और न कोई रास्ता
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8. गुरु का निरादर
दैनिक जागरण 16 मार्च 2007 जब मन कर्म वाणी सेमैं गुरु का अनादर करता हूंतब मैं उनसे सुस्नेह कीसयंमी होते हैं गुरु सदाकरते हैं शिष्य हित की बातमैं शिष्य हूं मन चलाकरता हूँ अपने मन की बातमन की बातों में रम करजब मैं गुरु को भूल जाता हूंखाता हूं तब ठोकरें दरदरगुरु से दूर हो…
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7. छात्रों की व्यथा
दैनिक जागरण 10 मार्च 2007हमें पर्चियां पहुंचा करपरीक्षा में नकल को न करो हवाअमूल्य जीवन भ्रष्ट हो जाएगाहमारी अयोग्यता को न करो हवानकल से परीक्षा में हम चाहे पास हो जाएंगेऐसे तो हम कभी योग्य नही बन पाएंगेआगे योग्य नागरिक तुम्हें मिलेंगे कैसेयोग्य डाक्टर इंजीनियर तुम्हें मिलेंगे कैसेहमारे इन अमूल्य जीवन पलों कोनकल की तुम…