जिज्ञासा-ज्ञान-जाग्रति

सत्सनातन शिव – शक्ति परिवार



नवीन लेख

विचार, संस्कृति, परिवार, समाज और जीवन-दर्शन पर चयनित लेख।

  • किशोर अवस्था

    इस अवस्था में बच्चे का ज्ञान और विवेक अपरिपक्व होता है l अच्छे बुरे या निषिद्ध कार्य का सही आंकलन नहीं होता है l वह जो भी कार्य करता है – उसे अच्छे बुरे या निषिद्ध कार्य का ज्ञान होना चाहिए l लेकिन वह कठिन और चुनौति पूर्ण जीवन यापन की अपेक्षा सुगम और सरल…

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  • बाल अवस्था

    यह वह अवस्था है जिसमें बच्चा नटखट होता है l कोई बच्चा बहुत नटखट होता तो कोई कम लेकिन होता अवश्य है l उसमें बोध और विवेक दोनों ही सुप्त अवस्था में होते हैं, जो उसकी आयु बढ़ने के साथ – साथ जागृत होते हैं l आरम्भ में उसे कुछ भी ज्ञान नहीं होता है,…

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  • जीवन की चार अवस्थाएं

    सत्सनातन धर्म में मनीषियों के द्वारा मानव जीवन की चार अवस्थाएं – बाल अवस्था, किशोर अवस्था, युवा अवस्था, और वृद्ध अवस्था निर्धारित की गई हैं l

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  • अखंड भारत

    – # अखंड भारत का ही दूसरा नाम सनातन है, समस्त भू- मंडल सनातन मय है।*- # हम भारतीय हैं – अगर विश्वभर में हमें कोई पहचानता है तो वह हमारे देश प्रेम, धर्म परायणता, भारतीय संस्कृति से ही जानता है।*- # स्वदेश से प्रेम तो करके देखो, विरोधियों से स्वयं दूरी न हो जाए…

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  • 1. कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था एवं ब्राह्मण समाज

    मातृवन्दना जुन 2025 धर्म और अधर्म – समय सूचक यंत्र की भांति समय वृत्त निरंतर घूम रहा है । परिवर्तन प्रकृति का नियम है । दिन के पश्चात रात और रात के पश्चात दिन का आगमन अवश्य होता है । विश्व में कभी धर्म का राज स्थापित होता है तो कभी अधर्म का । सृष्टि…

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  • ईश्वर दर्शन

    # जैसे रात में विचरण करने वाले उल्लू को दिन में दिखाई नहीं देता है, वैसे ही संसारिक सुख में मस्त रहने वाले को ईश्वर के भी दिव्य दर्शन नहीं होते है।*

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  • सद्भावना और दुर्भावना

    भावनाएं दो प्रकार की होती हैं – सद्भावना और दुर्भावना l सद्भावना से मनुष्य का अपना और समाज का उत्थान होता है जबकि दुर्भावना से दोनों का पतन होता है l मनुष्य को किस भावना से कार्य करना चाहिए ? ये बात उसकी बुद्धि और प्रकृति पर निर्भर करती है l सद्भावना और दुर्भावना में…

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  • आश्चर्य

    वास्तव में अँधा सूरदास नहीं, अँधा वो है जिसे सत्य नहीं दिखता l सूरदास ईश्वर दर्शन करता है और आँखों वाला पूछता है – ईश्वर कहाँ है !

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  • परम्परागत गुरुकुल शिक्षा

    – # परिवार में बच्चों को संस्कार मिलते हैं। गुरुकुल में उनका पोषण और संवर्धन होता है ।*- # संस्कार विहीन शिक्षा समाज के लिए अभिशाप है।*- आत्मानुशासन की शिक्षा परम्परागत गुरुकुल से ही मिल सकती है – माता-पिता के सानिध्य में पहला गुरुकुल घर है और दूसरा गुरु-आचार्य के सानिध्य में उनका गुरुकुल l…

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  • विद्यार्थी

    # आत्म विश्वास से युक्त पात्र ही गुरु से कुछ सीख सकता है l*

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