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आरक्षण प्रावधान – पुनरावलोकन की आवश्यकता

दिनांक 20 सितंबर 2023

“आरक्षण प्रावधान” की आवश्यकता –

भारत के अतिरिक्त विश्वभर में कहीं भी किसी राष्ट्र में आरक्षण व्यवस्था विद्यमान नहीं है l देश में “भारत सरकार अधिनियम 1935 – आरक्षण” का प्रावधान किया गया था । 1942 में बी आर अम्बेडकर ने “अनुसूचित जातियों” की उन्नति के समर्थन के लिए “अखिल भारतीय दलित वर्ग महासंघ” की स्थापना की थी जिसके माध्यम से उन्होंने सरकारी सेवाओं और शिक्षा के क्षेत्र में “अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण” की मांग की थी । देश की स्वतंत्रता के तुरंत पश्चात्, पिछड़े जन समूहों के लोगों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को पहचानने और उन प्रावधानों को लागू करने के साधन के रूप में, जिससे उन्हें संसाधनों और अवसरों तक उत्तम पहुंच प्राप्त हो सके, भारतीय संविधान में “आरक्षण” लागू किया गया था।

“आरक्षण प्रावधान” की निश्चित अवधि –

संविधान सभा के सदस्य हृदयनाथ कुंजरू ने कहा था – “संविधान के लागू होने के बाद दस साल तक आरक्षण के प्रावधान में कोई बाधा नहीं होगी लेकिन ये प्रावधान अनिश्चित काल के लिए लागू नहीं रहना चाहिए। इस प्रावधान की समय – समय पर जांच होनी चाहिए कि वास्तव में पिछड़े समूहों की स्थिति में बदलाव आ रहा है या नहीं।“

“आरक्षण प्रावधान” का उद्देश्य –

दलितों को अनुसूचित जाति का दर्जा देकर आरक्षण दिया गया था, क्योंकि वे हिंदू समाज में व्याप्त जाति – प्रथा के चलते सदियों से भेदभाव का सामना कर रहे थे । “आरक्षण देने का उद्देश्य” उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाना था।

“आरक्षण” और उसके दुष्परिणाम –

एससी, एसटी और ओबीसी को शिक्षा, रोजगार और पदोन्नति में समान अवसर प्रदान करने के लिए आरक्षण दिया जाता है । संविधान सभा के सदस्य हृदयनाथ कुंजरू के कथनानुसार आरक्षण दस वर्ष तक जारी रहना चाहिए था लेकिन दुर्भाग्यवश वह वर्तमान में विभिन्न राजनैतिक दलों के द्वारा मात्र संप्रदाय विशेष के तुष्टिकरण का हथियार बनकर रह गया जो उनके लिए वोट बैंक का कार्य करता है l जाति के आधार पर आरक्षण से सरकारी या गैर सरकारी सेवक तो सहजता से मिल सकते हैं लेकिन सेवा के लिए योग्य पात्र नहीं, आरक्षण प्रावधान में 30% अंक लेने वाले को सेवा का अवसर दिलाता है जबकि 90% अंक लेने वाला उससे वंचित रहता है l इसी तरह अगर देश में सरकारी या गैर सरकारी सेवा के लिए आगे भी योग्य सेवक वंचित रहे तो कुछ समय के अन्तराल में अयोग्य सेवकों के कारण जन, समाज, और देशहित की सेवायें दोषपूर्ण अवश्य हो जाएँगी l

सरकार द्वारा दलित, पिछड़ा वर्ग के परिवारों को जाति के आधार पर अनिश्चित काल तक आरक्षण दिया जा जाता है जिससे उनका जीवन – स्तर तो विकसित हो रहा है लेकिन स्वर्ण जाति का निरंतर उपेक्षित रहने के कारण मेघावी, प्रतिभायें उनसे बहुत पीछे जा रहीं हैं l समाज में अपेक्षित दलित समाज और उपेक्षित स्वर्ण समाज का जन्म हुआ है जिनमें विद्वेष और हीन भावना उत्पन्न हुई है l अच्छी सेवाओं के अभाव में जन, समाज, और देश का अहित होता है l प्रतिभाहीन देश में रहकर सरकारी सेवा करते हैं, उसका भरपूर आनंद लेते हैं जबकि आत्म ग्लानी से ग्रस्त प्रतिभावान राष्ट्र से पलायन करने या निराशा से ग्रस्त होकर आत्म हत्या कर लेने हेतु विवश हैं l   

आरक्षण पाने हेतु अपेक्षित दलित समाज और उपेक्षित स्वर्ण समाज दोनों में आपसी खींचा – तानी चल रही है जिससे देश की सार्वजनिक संपदा को हानि से भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है l राष्ट्रीय भावनाओं को ठेस पहुँच रही है, देश – प्रेम आहत हो रहा है l ऐसा होने से मात्र देश में छुपे हुये गद्दारों और देश के शत्रुओं का ही मार्ग प्रशस्त होगा, उनका साहस बढ़ेगा l जाति के नाम पर मिलने वाले आरक्षण से जन, समाज, राष्ट्र और धर्म – संस्कृति के विरुद्ध अनेकों कार्य और षड्यंत्र हुए हैं l इससे होने वाली क्षति की भरपाई समाज विरोधियों से न करके, निर्दोष जनता पर अतिरिक्त कर थोप देना, सरासर अन्याय संगत है l   

“आरक्षण” किसे, कब तक मिलना चाहिये –

किसी भी असमर्थ व्यक्ति को जीवन में आरक्षण मात्र एक बार, निर्धारित सीमा और निश्चित अवधि तक के लिए ही मिलना चाहिये l आरक्षण की समय – समय पर समीक्षा अवश्य होनी चाहिए l

जाति के आधार का आरक्षण अविलंब प्रभाव से मुक्त होना चाहिए l असमर्थ भी समर्थ बने, उसे समर्थवान बनाने का निरंतर प्रयास होना चाहिए l न जाति के आधार पर, न धर्म के आधार पर, आरक्षण बिना भेदभाव के, सबको मात्र आर्थिक दृष्टि से कमजोर को ही मिलना चाहिए ताकि वह भी “सबका साथ, सबका विकास” के अभियान में सबके साथ मिलकर चल सके l आरक्षण अपंगता, निर्बलता, निर्धनता, बे – सहारा और शहीद सैनिक परिवारों का सहारा के आधार पर होना चाहिए, वोट बैंक, निजहित, परिवारहित, जाति, धर्म और भेदभाव के आधार पर कदापि नहीं l

वर्तमान स्वार्थ पूर्ण सामाजिक व्यवस्था ने वैदिक वर्ण व्यवस्था को जातिवाद और धर्मवाद के आरक्षण का बाना पहना दिया है l अगर कोई जन, समाज या संगठन जनहित, समाज हित और राष्ट्र हित में सकारात्मक आवाज उठाता है, रचनात्मक कार्य करता है और लोग उसका साथ देते हैं तो इसमें बुरा क्या है ? इस सर्व कल्याणकारी भेदभाव रहित प्रयास से लोगों को संगठित होने की प्रेरणा तो मिल ही सकती है l देश में निर्धनता है, विकास के लिए हर निर्धन वर्ग में प्रतिभायें भी विद्यमान हैं तो फिर ये जातिगत आरक्षण क्यों है ? अगर देश, धर्म और संस्कृति के विरुद्ध आरक्षण की मांग करने वाले प्रदर्शनकारियों द्वारा सार्वजनिक संपदा को क्षति पंहुचाई जाये और उससे राष्ट्र प्रेमियों की राष्ट्रीय भावना को ठेस न पहुँचे, उनका देश – प्रेम आहत न हो, ऐसा कभी हो सकता है क्या ?

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