श्रेणी: स्वरचित रचनाएँ
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4. स्वदेशी
दैनिक जागरण 25 फरवरी 2006देश है प्यारा अपना स्वदेशीरहना है नित प्यारे स्वदेशजीना मरना लगे प्यारा स्वदेशीप्यार हुआ है संग प्यारे स्वदेशपा लेना है ज्ञान विदेशीभूल नहीं जाना है स्वदेशस्वदेश से नहीं प्यारे प्राण स्वदेशीस्वर्ग से भी प्यारा है स्वदेशउत्पादन बढ़ाना है देशी स्वदेशीपहुंचाना है उसे देश विदेशमुद्रा अर्जित करना देशी विदेशीचिड़िया सोने की फिर…
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3. स्वाधीन भारत
दैनिक जागरण 2 फरवरी 2006पराधीन देश में वो घड़ी लगती अच्छी थीस्थान स्थान पर तिरंगा फहराने कोलगाना जान की बाजी लगती अच्छी थीआज गीत वंदे मातरम गाने कोराष्ट्रीय गान का अपमान हो रहा क्योंहमारे स्वाधीन भारत मेंआतंकी संसद पर हमला हैं करतेहम आरपार की लड़ाई करने की हैं सोचा करतेउस पर हमला न करो वो…
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2. देख सके तो
दैनिक जागरण 8 जनवरी 2006 स्वामी सबका ईश्वर है प्राणी हैं अनेकजीवन सबका समान है देख सके तो मन से देखनारी सबकी जननी है माताएं हैं अनेकबच्चे सबके समान हैं देख सके तो मन से देखज्ञान जननी बुद्धि है मस्तिष्क हैं अनेकआत्म ज्ञान समान है देख सके तो मन से देखखून सबका लाल है विचार…
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1. चेतना
दैनिक जागरण 6 जनवरी 2006 सेवा जो कर न सकेवह तन है किस काम कानाम जो जाप न सकेवह मन है किस काम काकार्य जो सिद्ध कर न सकेवह धन है किस काम कासन्मार्ग जो दिखा न सकेवह ज्ञान है किस काम काजीवनरस जो भर न सकेवह धर्म है किस काम कामानवसृजन जो कर न…
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1. ज्ञान चालीसा
दिव्य हिमाचल 19.3.2005 1. लोक भ्रमण करने से विषय वस्तु को भली प्रकार समझा जाता है l 2. साहित्य एवंम सदग्रंथ पढ़ने से विषय वास्तु का बोध होता है l 3. अधिक से अधिक जिज्ञासा रखने से ज्ञान-विज्ञान जाना जाता है l 4. सुसंगत करने से विषयक ज्ञान-विज्ञान का पता चलता है l 5. बड़ों…